१। हमे जगाये भी रखा और ख़ुद भी न आए
सितमगर तुम्हे नींद तो आए पर माशूक के ख्वाब न आयें....
२। आँखें तेरी झलक को तरस रही हैं
होठों पर हँसी रुकी सी है है
समय बढ़ता भी नही और सांसें चल रही हैं
यह रात है की अब कटती नही
तुम आ भी जाओ यह कहना क्या बाकी है अभी?
Wednesday, April 30, 2008
Sunday, January 20, 2008
The Cold Winter
Time seemed to have frozen
Each breath more painful than the other
The numb inside colder than the outside
The whitesheet like a drape o'er the dead....
Blankness abodes the mind
Like the mist hanging over the lake
Nothing in sight
and yet everything is where it is supposed to be
The silence echos out loud
Like the screeches of a hungry and lost fawn
No sound escapes the mouth
The tears long gone
This winter will stay longer
But it will someday pass on...
Each breath more painful than the other
The numb inside colder than the outside
The whitesheet like a drape o'er the dead....
Blankness abodes the mind
Like the mist hanging over the lake
Nothing in sight
and yet everything is where it is supposed to be
The silence echos out loud
Like the screeches of a hungry and lost fawn
No sound escapes the mouth
The tears long gone
This winter will stay longer
But it will someday pass on...
Friday, January 18, 2008
The Lonely Road
Into the lonely forests the heart travels
Letting out an occasional sigh
It pains for the loss of none
It beats for no soul divine
The treacherous road has seen all
Yet it waits... waits for the traveler to come
It is not for the path to wish for a caravan's trail
It is not for it to follow behind
The wind that blows and the sky that looms above
They see all, bear all together
And still the road curves ahead...
Twisting like a snake praying for a prey
But loneliness stays on...
Long after the winds calm down
And the clouds clear
It is the inseparable partner
It is always there.....
Letting out an occasional sigh
It pains for the loss of none
It beats for no soul divine
The treacherous road has seen all
Yet it waits... waits for the traveler to come
It is not for the path to wish for a caravan's trail
It is not for it to follow behind
The wind that blows and the sky that looms above
They see all, bear all together
And still the road curves ahead...
Twisting like a snake praying for a prey
But loneliness stays on...
Long after the winds calm down
And the clouds clear
It is the inseparable partner
It is always there.....
Wednesday, January 2, 2008
रुकी सी ज़िंदगी
एक मुर्झिल सी पगडण्डी पर आज नज़र पड़ी
देखा तो लगा पहले तो नही थी
फिर आवाज़ आई ...यही तो ज़िंदगी रही
दिल ठहर गया... आखें खुली सी गयीं
यह मैं कहाँ थी ? यह किसकी ज़िंदगी ?
न कहीं सूरज का पता था... ना ही कहीं चन्द्रमा की शीतलता थी...
यहाँ तो बंज़र ज़मीन थी और कुछ भी नही
अँधेरे में सहारे को ढूंढते से हाथ आगे बढे
एक रुन्धी सी चीख गले सी निकली
नहीं ! नहीं जीनी यह ज़िंदगी ऐसी ज़िंदगी बेजान ज़िंदगी
तब अहसास हुआ ,
यूँ नही कि दिल खुश नही पर दुःख रहने के सिवा और कोई चाहत नही
एक सिहरन सी दौड़ गयी शारीर में
हाथ मैं खुरपी ले मैंने जंगल उगाया था
अपनी ख़ुशी को द्वार से लौटाया था
रेत मैं पद-चिन्हों को ढूंढ रही थी
सांझ को रात समझ रही थी
देखा तो लगा पहले तो नही थी
फिर आवाज़ आई ...यही तो ज़िंदगी रही
दिल ठहर गया... आखें खुली सी गयीं
यह मैं कहाँ थी ? यह किसकी ज़िंदगी ?
न कहीं सूरज का पता था... ना ही कहीं चन्द्रमा की शीतलता थी...
यहाँ तो बंज़र ज़मीन थी और कुछ भी नही
अँधेरे में सहारे को ढूंढते से हाथ आगे बढे
एक रुन्धी सी चीख गले सी निकली
नहीं ! नहीं जीनी यह ज़िंदगी ऐसी ज़िंदगी बेजान ज़िंदगी
तब अहसास हुआ ,
यूँ नही कि दिल खुश नही पर दुःख रहने के सिवा और कोई चाहत नही
एक सिहरन सी दौड़ गयी शारीर में
हाथ मैं खुरपी ले मैंने जंगल उगाया था
अपनी ख़ुशी को द्वार से लौटाया था
रेत मैं पद-चिन्हों को ढूंढ रही थी
सांझ को रात समझ रही थी
शुष्क पेड़ की तहनियां ही दिखती हैं
पर जड़ें संभालें थी... उम्मीद में जिंदा थीं
एक और सपने को मार नही सकती मैं
कुछ और पेड़ उखाड़ नही सकती मैं
इस घर और बंजर बना नही सकती मैं
यूं खुद को और मार नही सकती मैं
अब इस अध्याय का अंत यहीं होगा
पतझड़ तुम जाओ
बंसंत तुम्हारा कब सुखद आगमन होगा?
यह घर अब और नही रीता होगा ...
यह घर अब और नही रीता होगा...
पर जड़ें संभालें थी... उम्मीद में जिंदा थीं
एक और सपने को मार नही सकती मैं
कुछ और पेड़ उखाड़ नही सकती मैं
इस घर और बंजर बना नही सकती मैं
यूं खुद को और मार नही सकती मैं
अब इस अध्याय का अंत यहीं होगा
पतझड़ तुम जाओ
बंसंत तुम्हारा कब सुखद आगमन होगा?
यह घर अब और नही रीता होगा ...
यह घर अब और नही रीता होगा...
Thursday, June 14, 2007
यूं ही ....
लिखने का मन है पर अलफ़ाज़ कम हैं ...
हालात को बयाँ करने के लिए उम्र कम है
वोह काफ़िर खुश तो है आज मगर जिंदा नही
मैं मर कर भी जिन्दगी जीती रही
उस ज़ुल्मी का साथ नही यूं खुश हूँ
रोती हूँ मगर उस माशूक कि बेरहमी तले
तराशने चला था वो सौदागर मुझे
टुकरे-टुकरे कर गया
मेरा वजूद, इधर कहीँ भिखर गया
चुन -चुन कर जोढ़ूँ , उस जर -जर शरीर को या मिट जाऊं मिट्टी में मुझे क्या पता
एक -दिल था ,पत्थर का , वोह उसे भी तोढ़ कर कहीँ चला गया ...
हालात को बयाँ करने के लिए उम्र कम है
वोह काफ़िर खुश तो है आज मगर जिंदा नही
मैं मर कर भी जिन्दगी जीती रही
उस ज़ुल्मी का साथ नही यूं खुश हूँ
रोती हूँ मगर उस माशूक कि बेरहमी तले
तराशने चला था वो सौदागर मुझे
टुकरे-टुकरे कर गया
मेरा वजूद, इधर कहीँ भिखर गया
चुन -चुन कर जोढ़ूँ , उस जर -जर शरीर को या मिट जाऊं मिट्टी में मुझे क्या पता
एक -दिल था ,पत्थर का , वोह उसे भी तोढ़ कर कहीँ चला गया ...
Friday, May 25, 2007
Sunday, April 29, 2007
भंवर
टूटे हुए रिश्तों के तुक्रे संभल नही पाते हैं
कुछ आंखों में, कुछ दिल मैं चुब्ते चले जाते हैं
वक़्त का मरहम कुछ आराम देता है
पर हालात घाव भरने नही देते
ना वोह याद है अब, ना भुलाया ही है उसे
जब नही था, तब सब कुछ था, अब होके भी कुछ नही है
मैं आगे तो बढ गयी हूँ पर दुनिया किसी आस मैं है
जो फूलों कि सेज हो सकती थी, अब एक भूली हुई याद है
भावों के भंवर में दिन ढलते-गुजरते हैं
हर तरफ यादों के साए नज़र आते हैं
हक़ीकत कुछ आसान होती
अगर मेरी तरह बाकी दुनिया जाग चुकी होती
पर सच तो यह है कि ....
कुछ राहों पर वापिस नही चला जाता
कुछ मोंढौ, पर पीछे मूढ़ कर देखा नही जाता
कुछ रिश्ते सदा कि लिए नही होते
कुछ ख्वैशें पूरी होने के लिए नही होती
फिर भी यह मन-और-बाहर का मंथन खत्म नही होता
पिसती रहते है जिन्दगी हक़ीकत और ख्वैशों में
मेरी नींद तो कब कि टूट चुकी है
सो रही है दिनुया, डूबी है ना जाने किस ख्वाब में
कुछ आंखों में, कुछ दिल मैं चुब्ते चले जाते हैं
वक़्त का मरहम कुछ आराम देता है
पर हालात घाव भरने नही देते
ना वोह याद है अब, ना भुलाया ही है उसे
जब नही था, तब सब कुछ था, अब होके भी कुछ नही है
मैं आगे तो बढ गयी हूँ पर दुनिया किसी आस मैं है
जो फूलों कि सेज हो सकती थी, अब एक भूली हुई याद है
भावों के भंवर में दिन ढलते-गुजरते हैं
हर तरफ यादों के साए नज़र आते हैं
हक़ीकत कुछ आसान होती
अगर मेरी तरह बाकी दुनिया जाग चुकी होती
पर सच तो यह है कि ....
कुछ राहों पर वापिस नही चला जाता
कुछ मोंढौ, पर पीछे मूढ़ कर देखा नही जाता
कुछ रिश्ते सदा कि लिए नही होते
कुछ ख्वैशें पूरी होने के लिए नही होती
फिर भी यह मन-और-बाहर का मंथन खत्म नही होता
पिसती रहते है जिन्दगी हक़ीकत और ख्वैशों में
मेरी नींद तो कब कि टूट चुकी है
सो रही है दिनुया, डूबी है ना जाने किस ख्वाब में
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